Shia vs Sunni कैसे बंटा Islam ? | The Untold Story of Karbala | Explained | Karbala | Shubhankar
हर साल आपी गली से कुछ मुसल्मानों का एक जलूस निकलता है।जो काले कपड़े पहनते हैं, नंगे पाउं होते हैं और खुद को जंजीरों से मारते नसरा हैं।यह मुसल्मान उस आदमी के लिए रोह रहे होते हैं जोसे मरे हुए 1400 साल हो रहे हैं।इससे घबर हिंदु इतिहास हमेशा जीतने वालों का होता है ऐसा कहा जाता है लेकिन 1400 साल पहले जिस वेक्ती के गुजरने पर आज हिंदुस्तान समेध दुनिया के कई हिस्सों में ये जुलूस निकलता है उसके कहानी उस जंग की है जिसका इतिहास हारने वालों ने लिखा था वो साल था 680 ईरा अगर जंग के हसाब से देखें तो ये पूरी हार थी लेकिन 1400 सालों बाद जिस बाजशा ने वो जंग जीती उस बाजशा का नाम कोई अपने बेटे को नहीं देता कोई मुसल्मा और जिसने जंग हारी उन हारने वालों के घम में करुणों लोग सर्कुप होता जाते हैं अब सया वो सच है या इतिहासी किताबे कुछ और कहती हैं।उस जंग का वो कौन सा कमांडर था जिसने जंग की सुबे जीतने वालों का साथ छोड़ दिया और उधर आकर ख़ड़ा हुआ जहां मौत सुनिश्चित थी।
और क्या वहीं से ये नारा निकला कि जिल्लत की जिंदगी उस पूरे कतल्यां, पेगंबर के पूरे खानदान के सारे मर्द मार दिये गये थे।सिर्फ एक जवान मर्द संगब।और जो बचा था उसे तलवार नहीं बचाया था, ठाल नहीं बचाया था, उसे बुखार नहीं बचाया था।अब सवाल की भला, बुखार किसी की जान कै आज इस कहानी को विस्तार समझेंगे और इस कहानी को समझने के लिए आपको कर्मला को समझना पड़ें।हाँ, एक यखीन हम आपको दिलाते हैं कि शुरू से आखर तक इस कहानी में किसी का हम पक्ष नहीं लेंगे।सिर्फ वो बताएंगे जो इतिहास के पन्नों में दर्ज तुकि ये टॉपिक बहुत सिंस्टिव है।
बहुत, बहुत, बहुत सिंस्टिव है।और कईयों का मानना था कि इस टॉपिक पर शुबहांकर मिश्रा होकर वीडियो बनाना सही नहीं है।लेकिन हमें लगा कि जानकारी कभी खराब नहीं होती।और सच का सिर्फ एक वर्जन होता है सच जूत में आपको सोचना पढ़ता है सच बोलने के लिए क्या सोचना है इसलिए आज शिया और सुन्नी इसलाम में कैसे बटे इसका सच हमार वो इनकी अज्जद करते हैं और उन्हें हजरत और इमाम जैसे एहतराम के लवजूं के साथ याद करते हैं।लेकिन कहानी की रवानी के लिए मैं आगे नामें।पर एहतराम हर नाम के साथ आप शामिल समझेंगा।
ठीक।ये आपसे घुजारिश हैं तकि नियत पर सवाल न नमस्कार मैं हूँ शुभांकर मिष्णा और इस कहानी के शुरुवात करें उससे पहले एक चुटी सी रिक्विस्ट हमारी आप से है क्योंकि बहुत इस इंस्टेट टॉपिक पर बहुत ही डिटेल डिसेर्च के साथ ये वीडियो हम बना रहे हैं काफी समय इसकी पढ़ाय लि ताकि हम और आप अपने रिश्टे को मज़बूत कर सकें और आगे भी ऐसे sensitive issues पर जब हम वीडियोज बनायें तो वीडियोज आपके WhatsApp पर पहुंच जायें ताकि आपको खोजनी की जरूत ना पढ़े या फिर फीड में कभी दिखाई पढ़ जायें वैसी नौ बन पाएं।त और इस कहानी को समझने के लिए पैगंबर की मौत से थोड़ा पीछे चलना पड़े।एक ऐसी जगे जिसका नाम शायद आपने ना सुना हो, पर जिसपर आज भी सबसे बड़ी बहस्त की है।नाम।गदीरखुम 16 मार्च 632 गो पेगंबर मुहमस साहब अपनी आखरी हजयातरा से मदीना लौट रह थे रास्ते में गदीरखुम नाम के एक जगे पढ़ती है जहां से अलग अलग रास्ते अलग अ जो आज तक दोराई जाती है कि जुसका मैं मॉला हूँ उसका अली भी मॉला है अब यहाँ पूरा पेच इसी एक शब्द में है मॉला यह अरबी का ऐसा शब्द है जो उसके कई मतलब है इसका मतलब मालिक और नेता भी होता है दोस्त और अपना आदमी भी होता है और यहीं से वो इस दिन को इदे गदीर के तौर पर आज भी मान थे।
और दूसी तरफ के लोग कहते हैं कि मॉला का मतलब यहां नेता नहीं।वो बताना चाह रहे थे कि ये मेरे अजीज हैं, प्यारे हैं, मेरे अपने हैं।अली की तारीफ और महबत कैसे हा था?कोई गद्धी सौंपने जो शब्द कोट किया गया वो नेता के लिए था या प्यारा दोस के लिए था।और यही वो सवाल पहली बार हवा में आया कि पैगंबर के बाद कॉंब की कमान किसके हाल।जो आगे चलकर एक घहरी खाई बन गया।
खाई तब खुलकर सामने आयी जब कुछी हफ्तो बार पैउस दिन मदीना शहर में स्लाम के आखरी पेगंबर मुहमस साहब दुनिया से रुखसत करते हैं।उनके जाते हें मुसल्मानों के सामने एक ऐसा सवाल ख़ड़ा हुआ जिसका जवाब आज 1400 सालों बाद भी नहीं मिला है।सवाल ये कि अब कौम की अगवाई कौन करेगा?यानी खलीफा कौन करेगा?खलीफा मतलब मुसल्मानों का सबसे बड़ा सद्धार जो दीन भी समाले, सल्तनत भी समाले इस सवाल पर लोग दो राह में बढ़ गए एक तपका कहता था कि अगवाई पैगंबर की अपने खांद मतलब घर के आप में, बश्बन से पेगंबर के साथ पले बढ़े, उनके दिल के करीबी. दूसरा तपका कहता था कि ये खानदान का मामला नहीं है, कौम को खुद तैं करना है कि सद्धार कौन होगा?
जो सबसे काबिल होगा, वो बन जाएगा. जो लोग हजरत अली के हक यानी पैगंबर की सुन्नत उनके बताये तरीकों पर चलने बाद।आसान भाषा में समझें तो जगडा वही था जो आज भी हर दुकान, हर खेत, हर कंपनी में दिखता है।गधी घर के आदमी को मिलें या उससे जो काबिल हो।उस वक जीत जो थी वो सुन्नी लोगों के लि और अली जिनने आप हज़त अली कहते हैं वो पीछे रहके हैं।उनके चाहने वालों के दिल में ये बात कांटे की तरह चुपी है।लेकिन फिर साल, 656 में एक एसी घटना घटित हुई जो उसने सब कुछ बदल कर रख दिया।
हिला कर रख दिया।खलीफा उसमान की उनके �मारने वाले कोई बाहरी दुश्मन नहीं थे।वो उसी कौम के थे नाराज मुसल्मान जो उस्मान के कामकास से ख़फा थे।इस कतल के बाद आखिरकार अली खलीफा बन जाते हैं।वही अली जुनका नाम 24 सालों पहले चला था।
लेकिन गधी तब मिली जब घर में हाक लग यहाँ पर बात जबान से आगे बढ़ती है तलवारे निकाली जाती हैं और मुसल्मान पहली बार आपस में लड़ने लगते हैं इन लड़ाईयों को इतिहास में फितना कहा जाता है मतलब घर के अंदर की जंग एक जंग में तो खुद पेगंबर साहब की बेवा आईशा जी � अब यहाँ एक बात आप और समझें आईशा जी के लिए लड़ाई गद्दी के लिए नहीं थी उनकी मांग बस इतनी थी कि वो उस्मान जी के कातिलों को सिजा दिलाएं और रिवायतों में अब रिवायत यानी पुरानी खिताबें और पीडियों से चली आरी कहानियों में इ दोनों की फोजें सिफीन नाम की जगे पर भिडती हैं महीनों की लडाई होती हैं हजारों लाशियें और फैसला फिर भी नहीं आता है आखर में तैह होता है कि तलवार छोड़िये बाचीत से मामला सुलजाय जाये और इसी फैसले ने अली साहब को अंदर से तोड़ दिया क्य इनकी सोचती की फैसला सिर्फ खुदा का होता है, इनसानों की पंचायत का नहीं है और इसे कटरता में ये अली और मुआविया दोनों को अपना दुश्वन मान लेते हैं।यानी एक तरफ मौविया की फोज, दूसरी तरफ अली सहब के अपने बुराने सिपाही जो अब उनकही खुन के प्यासे थे और हर लड़ाई के साथ हजरत अली की पकड जो है वो काफी जादा कमजोर हो गई इसके बाद साल 661 में वो हुआ जोसे ने हजरत अली के चाहने वालों के दिल में पहला गहरा जखम दिया कुफा शहर के मस्जट में कुफा जो लोग नही उन्ही खारीजियों में से था जो कभी इनकी अपनी सेना में लड़ चुका था।दो दिन तक जिंदगी मौत के बीच संघर्ष चली और उसके बाद अली सहब के मिरती हो जाती हैं।दुनिया से वो रुखसत कर जा था।क्यानी जिस आदमी को पैगंबर के घर का वारिस माना حضرت علی کے بڑے بیٹے جنہیں امام حسن کہتے ہیں انہوں نے ایک فیصلہ لیا جس کی امیت کسی کو نہیں تھی لڑنے کے بجائے گدی کو چھوڑ دیا پر چھوڑنے سے پہلے ایک سمجھوتہ کروایا جس میں لکھا کچھ ایسا جو آگے کی پوری کہانی کربلا کا پورا خون خرابہ تائیں کرتا ہے کہ اگر ٹوٹا تو ایسا کچھ ہوگا اور یہی ہوا اب سوال ہے کہ وہ کون سا وعدہ تھا جس کے ٹوٹنے سے کربلا کے بنیاد پڑی تو سال 661 تھا جس हसन ने कहा कि मैं गद्दी तुम्हें देता हूँ ता कि कॉम का खून भैना बंद हो जाया पर शर्त है पहली शर्त कि तुम इनसाफ से हुकूमत करोगे दूसरी सबसे बड़ी शर्त तुम अपने बाद गद्दी अपने बेटे को नहीं दोगे अगला सरदार चुनने का
हख वापस कौम के पास जाएगा।मौविया ने शर्ति मान लिए।खलीफा बन गए।हसन सब कुछ छोड़कर मदीना वापस लौटाये।करीब 10 साल तक अमन रहा।लेकिन फिर साल 670 में हसन सहब की मौत वही हुसैन साहब जिनने दुनिया इमाम हुसैन के से सामने बताया और जिनके नाम को लेकर आज भी मातम होता है।
यह पैगंबर के नवासे यानि उनकी बेटी फातिमा जी के बेटे थे।कहते हैं कि पैगंबर साहब ने इने कभी कंधों पर बिठा कर खुमा है।लेकिन फि खलीफा का ओदा एक जटके में बाजशाहत में तब्बील कर दिया गया।कई बड़े लोग इस फैसले के खलाफ हो गया।उनमें सबसे बड़ा नाम इमाम हुसैन का था।अप्रिल 680 में मुआविया के मौत होती है।
और पुराने तिहासकार लिखते हैं कि मरने से पहले अ� का मतलब होता है वफादारी कसम हाथ पर हाथ रख कर कभूल करना कि तुम मेरे खलीफा हो।جیسے کی بیعت نہیں کر سکتا اور اسی رات حسین صاحب اپنے پریوار کے ساتھ مدینہ چھوڑ کر مکہ چلے آتے ہیں مکہ کیوں گئے تھے اس کی بھی ایک کہانی ہے کیونکہ مکہ کے اندر خون بہانا حرام مانا ہے اور یہاں پر وہ پونتہ محفوظ تھے اب کہانی میں واپس لوٹ کر آتے ہیں کفا وہ شہر جہاں پر حضرت علی مارے گئے تھے اور जहां हजरत अली के चाहने वाले घर घर में थे।कुफा के लोगों ने इमाम हुसैन को खत भेजने शुरू किये।रिवायतों के मताबग हजारों खत गये।और सब में एक ही पुकार थी कि आप आईए।आप वापस आईए।
हम यजीत से तंग आ चुकें।हम आपके लि مسلم عبر اقیل کو کفا بیجا شروعات میں اچھی خبر آئی ہزاروں لوگوں نے کہا کہ عبر کے ہاتھ پر حسین کے نام کی بیعت کر لی گئی ہے اور عبر نے خط لکھا کہ آ جائیے کفا تیار ہے اور یہی وہ خط تھا جس نے حسین کو ریگستان کے راستے پر ڈال دیا مکہ میں کئی بڑے لوگوں نے انہیں سمجھانے کوشش کی کہ کفا والوں نے آپ کے پتا کو دھوکا دیا آپ کے بھائی کو دھوکا دیا کسی نے کہا کہ جانا ہی ہے تو آپ پلیز عورتوں اور بچوں کو ساتھ مت لے جائیے लेकिन हुसेहन साहब जिन आप इमाम हुसेहन कहते हैं वो रुके नहीं और September 680 में अपने परिवार और साथियों के साथ वो मक्का से निकर गयें।कुल जमाब 50 के आसपास लोग थे।जिन में औरतें चोटे बच्चे भी शामल थे।जब वो जा रहे थे तो रास्ते में एक और ये एक लाइन आगे की पूरी कहानी का खुलासा थी।पर हुसेहन साहब फिर भी आगे बढ़ते रहें।
उदर कुफा में खेल पलट चुका था।यजीद ने वहाँ पर एक नया गवर्णर बिठाया।जिसका राम था,उबेदलला एबर जियात जो अपनी बेरहमी के लिए बदना था उसने शहर में ऐसा खौफ बिठाया की जो गलियां हुसैन साहब के नाम से गूँशती थी वहाँ शाम ढलत पर इमाम हुसैन ने रास्ता नहीं बदला और फिर रेगिस्तान के बीच एक फोजी टुकडी ने उनका रास्ता रोका।अब यहां पर जिस टुकडी ने रास्ता रोका, इसके कमांडर का नाम भी आप याद रखेगा।इस कमांडर का नाम था हुर।
क्योंकि आगे यही हुर हुर की फोज रेगस्तान में प्यास से बिहाल थी।लेकिन इमाम हुसैन ने सामने दुश्मन बनकर खड़ी उस फोज को अपने काफिले का पानी पिलाया।आद्मियों को भी, घोडों को भी।हुर ने इमाम हुसैन को ना कुफा जाने दिया, ना मधीना लोटने दिया।बस गम तो इस महीने से आगे की तारीकों में जुड़ा।तो आखिर में मुहर्रम महीने की दो तारीक को इमाम हुसैन न काफिला एक सूखे विरान मैदान में रूख दिया गया।
यहां पर नदी थी जो इसका नाम था फुरात।फुरात नदी से थोड़ी दूर एक मैदान थानाम था करबला और अगले ही दिन कुफा से असली फोज वहाँ पहुँच जाते हैं इस फोज के कमांडर था उमर एबरिसाद और इतिहास कारू के मताबग उसके पास करीब चार हजार सिपाई थे मतलब इमाम हुसैन के हर आदमी के सामने 55 से धिक सिपा� उसकी बैद कर लीजिए उसके बाद हम आपसे कोई बात करेंगे।फिर मुहर्रम किसाथ तारीख को वो हुक्म आया जो इस पूरी कहानी का सबसे बेरहेम हिस्सा है।एबरिजियाद ने फर्मान बेजा के मां मुसायने केम्प को पानी बंग कर दो।एक बून पानी ना पहु हमारे अपने घर में एक दिन पानी ना आये तो क्या हालत होती है और वहाँ तीन दिन तक ये रहा और अगर आप पानी पीने जाएंगे तो तलवार वाला फोजी ख़ड़ा है अब यही वो जगे है जहाँ रेगिस्तान में इमाम हुसैन ने फोज के प्यासे सिपाहियों को पा रिवायत ये है कि उन्होंने चिराग तक बुजाये ताकि जाने वालों को शर्मिंदिगी न हो।
लेकिन जब रौष्णी लौटी तो कोई भी गया नहीं।कुल मिला कर वहाँ 72 लोग थे जितमें कई मुड़े भी थे।और सबने कहा कि हम रहेंगे।पर दसवी मुहररम की स�वही हुर जो उसने सबसे पहले एमाम हुसैन के रास्ते को रुका था वो अपना गोड़ा यजीत की फोज्च से निकाल कर एमाम हुसैन एक कैम के तरफ लिया आया।उसने सिर जुकाया माफी माँगी।
रिवायते कहती हैं कि उसके जबान पर एलाइन आयी थी कि जननत और जह जंग से पहले इमाम हुसैन खुद घोड़े पर बैठ कर सामने वाली फोज्चे खरीब आया और आखरी बार पूछा कि क्या तुम ही ने मुझे खत लिक्कर नहीं बुलाय था और क्या मैं तुम्हारे नबी की बीटी का बेटा नहीं हूँ मेरा कसूर बताओ या मुझे ल फोज ने दस्तूर तोड़ दिया तीरों की बारिश के साथ हमला बोला खई वो बुजर्ग भी मारे गये जो ख़ुद पैगंबर के साथ बैठे थे इमाम हुसैन का जवान बेटा अली अकबर भी मारा गया कहते हैं उसकी शक्न पैगंबर से मिलते थी और इमाम हुसैन उसे मै� मुसल्मान समाज बड़े अत्राहम से लेता है, इमाम कहकर, हजद कहकर ये सब एक परिवार के लोग, पैगंबर के परिवार कोई बाप, कोई बेटा, कोई भाई, कोई भतीजा और सब के सब को माँ हुसेन सहाब के भाई अबबास जो काफले के जंडा उठाते थेशिया कथाओं में ये मनजूर यूँ बयान होता है कि वो बच्चों के लिए पानी लाने नदी तक गए और मशक जिसे पानी भरने की चमडे की थेली कहते हैं उसने भर भी लिया लौटते वक्त उनको भी घेर इमाम हुसेन अकेले बचे ठके भूंके प्यासे जक्मों से चूर और फिर उन पर चारो तरफ से हमला हुआ उनके सिर को धड से अलग कर दिया गया।उनके सिर को धड से अलग करने वालों का अगर आपको नाम जानना है तो जो पुराने स्तुरोतने हैं उसमें दो नाम आते है यह उसका जवाब है।उस दिन उसकी बिमारी उसकी ढाल बड़ गया।वो लडने लायक नहीं थे इसलिए बच गया।इतिहास था खेल देखे आगे चलकर पेगंबर की खांदान की पूरी नसल इससे एक बच्चे हुए बिमार बच्चे से निकलें।
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— Ruben, Netherlands
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Get started freeयानि उस दोपहर अगहलाकि इसमें दूसरा पक्षबी है जंग के बाद इमाम हुसेन एकेम को लूटा गया तम्बूव में आग लगा गयी बचेवे लोगों कैदी बना कर पहले कुफा और बाद में दमिश ले जाये गया सीधे यजीत के दरबार था शहीदों के जो कटे हुए सिर थे उन्हें ने� जंजीरों में बंधी एक कैदी उरण और फिर डमिश के उस बाजार में जहाँ रेश्मी गद्दियों पर सल्तनत के सरदार बेटे थे सामने बेडियों में एक उरण खड़ी थी जैनिब उन्हें जो तक्रीरे की उसे 14 सालों बाद भी आज भी पढ़ा और सुना आता है रिवा करबला में तलबार यजीद जीता था पर कहानी में जैनब जीजीद गई और आज हिसाब दिखिए यजीद के नाम से लोग कत राते हैं और जैनब के नाम पर घर -घर में बेटिया हैं सोचने वाली बात तरबार में बैठे लोगों का मन पलटने लगा और बात शहर -शहर फैल यानि वो मैफिलें जिन में आज भी हर मुहर्रम में करबला की गहानी सुनाई जाती है और सुनने वाले रोते हैं. इमाम उसैन की शहादत यजीत की हुकूमत के गले की हटी बन गई और खुद यजीत की मौत करबला के सिर्फ तीन साल बाद हो चालीस की उम्र भी नहीं देख �फिर जगे जगे बगवते फूटी कुछी सालों में कुफा में मुखतार नाम की आदमी ने उठकर करबला का बदला लिया और उमर एबरिसाथ से लेकर एबरिजियात तक करबला के मोहरम की 10 तारीक जिसे आशुरा कहते हैं मातम का डडड हैं हिंदुस्तान में इसमें ताजिये का अपना रिवास जुड़ा ताजिया यानी इमाम हुसैन के मकबरी की नकल में वो सज्जे हुए धाचे जो जलूस में निकाले जाते हैं और आखर में दफन की आते हैं कहीं लो� امام حسین کی شہدت کے چالیسویں دن کو اربین کہتے ہیں اور اس دن دنیا بھر سے لوگ سیکڑوں کلومیٹر تک پیدل چل کر کربلا پہنچتے ہیں گنتی کروڑوں میں بھی آتی ہیں اس آدمی کے قبر پر جس کے ساتھ مرنے والے صرف 72 لوگ کھڑے تھے جس کربلا کے میدان میں امام حسین کو پانی کے ایک گون نہیں دی گئی آج اسی راستے پر ہر کچھ خدم پر لوگ مفت کھانا اور پانی لے کر مرتے ہیں अब यहां आपके मन में एक सवाल आना चाहिए कि अगर करबला इतना बड़ा जुल्म था तो सारे मुसल्मान मातम क्यों नहीं करते।जिसका जगर हमने शुरू में किया था।शीया और सुन्नी एक ही घम को दो अलग नजरों से क्यों देखते हैं।और यही से खुलता है द� फर्क इस बात का है कि उस दिन को याद कैसे किया चाहें।
सुन्नी सोच में सीना पीटना और खुद को तकलीव देना दीन के खिलाफ माना आता है।इसलिए बहुत सारे सुन्नी आशुरा के दिन मातम नहीं रोजा रखते हैं।यह जीत पर भी राय बढ़ी हुई है।कुछ सآلم یعنی دین کے جانکار انہیں کھل کر ظالم کہتے ہیں تو کچھ کہتے ہیں قتل کا سیدھا حکم انہوں نے نہیں دیا تھا یہ ان کے گورنر ابرج جیات کی کرتود تھی اور یہ بحث 1400 سالوں سے جاری ہے معاویہ کو بھی سنیوں کی نظر میں ویلن کی طرح نہیں دکھاتا وہ پیغمبر کے ساتھیوں میں سے تھے اور سنی مانتے ہیں کسی ساتھی کو برا کہنا دین میں جایز نہیں اس لئے بہت سارے سنی अली और मुआविया के जगडे को सही बनाम गलत की लड़ाई से नहीं बलकि दो नेक लोगों के बीच राय के फर्क को मानते हैं यानी जगडा इस बात पर नहीं है करबला में जुल्म हुआ था या नहीं जगडा इस बात पर है कि उसके याद कैसा किया जाए उसका असली जिम बात के सुन्नी इतिहासकार भी एब्र कसीर जैसे हमों बेश यही गिंती दुहराते हैं एक लाख वाले गिंती बात के किस्सों में वढ़ते वढ़ते बनी और यही बात जंग के बारीख बातों पर भी लागुए हैं अली अजगर का तीर हो ये आपबास की मश्चक यह डिटे امام حسین کی طرف کی گنتی بھی روایتوں میں 72 مشہور ہے جبکہ تیہازکار 70 سے 100 کے بیچی مانتے ہیں پر یہاں پر ایک بات سمجھنے والی ہے ظلم کا وزن گنتی سے نہیں تولاتا 72 آدمیوں کے سامنے 4000 بھی اتنے ہی بڑے پہاڑ تھے اور پیاسے بچوں کو پانی روکنے والی 4000 کی فوج ہو یا 1 ,00 ,000 ظلم برابر ہے آج دنیا کے ہر 10 مسلمان میں قریب ایک یا دو شیعہ ہیں ایران دنیا کا سب سے بڑا شیعہ ملک ہے عراق میں بھی آدھے سے زیادہ لوگ बाकी मुल्क सुन्नी हुकुमुतों के हाथ में हैं इरान और सौधी अरब की जो खिष्टान आप खबरों में देखते हैं यमन से लेकर लेबनान तक जो लडाईयां चलती हैं उनमें तेल भी है, सियासत भी है, ताकत भी है लेकिन इन सब के पीछे सबसे पुरानी लकीरयही शिया और सुन्नी की है यानी 1400 साल पहले रेगिस्तान के कोने में जो हुआ था वो आज भी नकशे पर बदल रहा है एक बात साफ शिया और सुन्नी नाम के धडे करबला से पैदा नहीं वो कुफा से आई थी यानि उसमें बड़ी तादात उन लोगों की थी जिनोंने कुछ हफ़ते पहले इमाम हुसैन को हजारों खत लिकर बलाया था कि आईए हम आपके लड़ेंगे मतलब जिनोंने बलाया मारने वालों में वही शामत कोई इनाम के लालश में था कोई इब जीत की किसी उमीद के ये जीत के खानदान की फोज से लड़ने निकल पड़ें।
और लगबख सभी के सब मारें गए।जिंदा रहकर जो कर्ज नहीं चुका पाए, वो मरकर चुकान लिखले थें।इतिहास उन्हें तवाबीन के नाम से जानता है।मतलब तौबा करने वाले यह कहानी थी शिया और सुन्नी के अलग होने के।यह कहानी थी कर्मला के।यह कहानी आपको कैसी लगी?
इसके तत्थे कौन से आपको हैरान कर रहे थे?कौन से तत्थे आप नहीं जानते थे?कोमेंट सेश्न बताएगा।इस कहानी के शुरुवात से पहले भी हमने कहा था किइस वीडियो को अधिक से अधिक संख्या में शेयर कीजेगा और हो सके तो WhatsApp पर आईगेगा।मुझे वेक्ति के तौर पर खुशी होगी।
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