Why Ban Satluj? | Punjab 95: Film & Controversy Explained | Diljit Dosanjh| Jaswant Khalra| KPS GILL
तीन जुलाई 2026 की रात एक फिल्म चुपचाप रिलीज होती है।अगले ही दिन उस फिल्म का हीरो इंस्टेग्राम पर लाइब आता है।उस वक लोग हसते हैं इसे मज़ाग समझते हैं लेकिन सुमवार आने से पहले रविवार की शाम को फिल्म हिंदुस्तान से घायब करत आप सोच कर देखिए कहानी सुनते सुनते मानों किसी ने आप से बीश में किताब चिन लिया।उस हीरो की वाद सच निकली।लेकिन अब आप ठहर कर सोचिए कि एक अक्टर को कैसे पहले से पता था कि उसकी फिल्म को हटा दिया जाएगा।और इस सवाल का जवाब जानने के तभी कुछ गाड़ियां आकर रुकती हैं, कुछ लोग उतरते हैं और वो आदमी दिन दहारे अपने ही घर के सामने से हमेशा के लिए गायब करते रहता है।
31 साल हो गए, लेकिन उसकी लाश कभी नहीं है।और उस आदमी का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने हजारों गुम्चरहे थे।जो उससे और लोग इस फिल्म को देख रहे थे।सोशल मेडिया पर लिखा गया कि हाल के सालों की सबसे ताकतवर हिंदी फिल्म है।Zee5 की भी तारीफ हो रही थी कि बहादुर दिखाईये इस फ अब सवाल है कि कौन से हालात?
किसका दमा?Zee5 ने से कोई ज़िकर नहीं किया और कमाल देखिए अभी भी ये फिल्म विदेशों में Zee5 ग्लोबल पर आराम से चल रहे है याने इस फिल्म को पूरी दुनिया देख सकती है बस वो मुलक नहीं देख सकता जिसकी ये कहा था और कह एक सो बीस कट लगानी की बात होती है और जैसे तैसे वो रिलीज होती है वो भे गाया है हैरानी है न पर सच है यह कहानी है तीन गुमशिद्गियों की और तीनों की वज़ा एक ही है सच सच कि वो पचीस हजार कौन लोग थे कहाँ चले गए क्यों मारा विया वो?क्या ये जललेकिन जलियावाला बाग में तो मारने वाले अंग्रेज थे।इन्हें मारने वाल को।और आज इन सारे सवालों के हम आपको जवाब देगें।
हम आपको इस फिल्म की पूरी कहाणी बताएंगे।जिनोंने फिल्म नहीं देखी हैं, वो इस फिल्म से पूरी तरा वाक्रि� फिर सुनेंगे कि देश दो हिस्सों में बटकर क्या कह रहा है।और इसके बाद, क्योंकि फिल्म हटा दी गई है, हम आपको इस फिल्म की पूरी कहाणी सुनाएंगे।शुरू से लेकर आखर तक।ताकि आप फैसला कर सकें कि इस फिल्म से डर आखर किसे लगा, क्यों लगा हम चाहते हैं कि आप हमारे WhatsApp चैनल से भी जोड़ जाएं ताकि हमारा आपका रिष्टा मज़बूत हो और ये सी कहानियां जो हम इंडिपेडेंड होकर पूरी इमानदारी के साथ बनाते हैं ताकि सच न दबपाएं वो सच आप तक बहुंचता रहें।आपके लिए जानना �
पर शुबहांकर सर्च कीजेगा हमें सब्सक्राइब कीजेगा और इस कहानी को जितने जानने वाले चाहने वाले हैं उनसे शियाल लेजेगा अब आपके सवालों के जवाब शुरू करते हैं कहानी से पहले आपको बताते हैं की ये फिल्म जो है जिसका नाम पंजाब 95 था वो इस फिल्म में पैसा लगाया था रॉनी स्क्रू वाला की RSVP और Mac Guffin Pictures ने।इस फिल्म का सबसे पहला नाम रखा गया था घल्लू घारा मतलब होता है कतलेयाम।सिखों के इतिहास में ये शब तीन बड़े कतलेयामों के लिए बोला जाता है।पहला 1746, दूसरा 1762, और तीसर ये फिल्म सेंसर बॉर्ड के पास पहुची और यहीं से इस फिल्म के कैज चुरू हो गई।शे महीने बाद बॉर्ड ने कहा के 21 कट लगाओ और फिल्म का नाम बदल दो।फिल्म वालों ने तब नाम बदला और इसका नया नाम पढ़ा पंजाब 95।
पर कट्स के खिलाफ वो पहले जो 21 कट लगे थे वो 120 के पार हुए।खुशखबरे तो 127 कट सक कहती हैं।और मांगे भी क्या क्या?जरा सुनिये, कहा गया कि हीरो का नाम बदल तो, पंजाब पुलिस का नाम हटा तो, यहां तक की तिरंगे वाले सीन जो हैं वो भी हटा तो, यानी इस कहानी से इस कहको निकाल दो और फिर दिखा दो।हनी त्रिहान ने बताया कि हम एक लिस्ट की आपतियों को निप्टाते तो अगली लिस्ट आती।
उन्होंने कहा कि एक वक्त तो उन्होंने कह दिया कि मैं फिल्म से अपना नाम हटा लूँगा पर कट नहीं लगा।द पूरी की पूरी एक भी सीन बिना काटे।कीमत जो थी वो बस नाम की चुकानी पर।एक फिल्म तीन नाम।पहले गल्लू घारा, फिर पंजाब 95 और फिर जो रिलीज हुई उसका नाम था सतलुज।और यहां वो बात जो इस पूरी बहस का सबसे बड़ा जवाब है।
खु� परिवार की मंजूरी वाला वर्जन है।परमजीत कौर ने खुद देख कर पक्का किया कि ये वही फिल्म है जो उन्हें पहले दिखाई गई थी।सिर्फ नाम बदला है एक भी सीन नहीं।यानि जिस औरत के पती की कहानी को इस कहानी में दिखाई गया।जिस औरत के पती को इसका जवाब है कि दिलजीत में सिर्फ करिदार नहीं जिया था, इस फिल्म की किस्मत भी जी थी।दिलजीत दोसान जी जानते थे कि वो फिल्म जिसके नाम को तीन बार बदला गया, जिसे चार साल में हर लिस्ट, हर कट, हर टलती तालिए बदला गया।
थी, वो जानते थे कि शायद रिलीज के चार दिन भी फिल्म नहीं चल पाए।इसलिए हस्ते हस्ते उनोंने ये कह दिया था कि डाउनलोड कर लो, कब पता गायब हो जाये।और फि उसे दो दिन में क्यों नहीं दिये गया?हाला कि सत्रुश फिल्म जुसका नाम पहले पंजाब 95 था उसको लेकर देश दो हिस्सों में बटा है फिल्म हटते ही देश दो केमां बटा है दोनों की बाते ध्यान सुनीएगा क्योंकि असली बहस यही है एक तरफ वो लोग हैं जो � लोग तो ये भी सवाल उठा रहे हैं कि जिस वक्त की एक घटना है उस वक्त तो देश में कॉंग्रेस की सरकार थी पंजाब में कॉंग्रेस की सरकार थी आज देशें बीजेपी की सरकार है फिर बीजेपी की सरकार को कॉंग्रेस की सरकार के दौरान हुए कांड से इतना डर क् कॉंग्रेस वाला सवाल ही बहुत इंपोर्टेंट है कि कॉंग्रेस राजच का ये पंजाब था तो आज बीजेपी को क्या समस्या है?फिल्म भटाने की वज़ा तक नहीं बताई गई है और सबसे दिल छूलेने वाली बात कईयों ने कहा कि ये फिल्म का हटना सिर्फ फिल्म का हटना नहीं है ये यादों पर हमला है जो आदमी 1995 में गायब किया गया उसके कहानी 2026 में गायब कर एक पक्षे जो कह रहा है कि फिल्म पंजाब के उस वक्त के मुख्यमंतरी बेयन सिंग् की हत्या को जिस अंदास में दिखाती है वो गलत है।उससे कहना है कि फिल्म पर हत्या को कुछ ऐसे पेश किया गया मानों वो जुल्म का जवाब हो।
कि जो मुख्यमंतरी को मारा गया उ सतलुष फिल्म पंजाब 95 का विरोध करने वाले ये भी कह रहे हैं कि ये फिल्म पुलिस का हॉसला तोड़ती है।वो कहते हैं कि याद कीज़े पंजाब उस दौर में जल रहा था।बसों से उतार कर लाइन में खड़े कर कर मुसाफिरों को मारा जा रहा था।खासतोर पर प को जिस नेगेटिविटी सी ये फिल्म में दिखाये गया है क्या वो ये भूल जाते हैं कि दूसरे तरफ भी माई थीं जो राह देखती रहे गईं वहाँ भी बच्चे थें जोनें बाप खोईं दर्दवर्दी देख कर नहीं आता मज़ाप पूछ कर नहीं आतावो कहते हैं कि हमारे लिए कोई सतलुज नहीं बनाए गई।और खासतार पर सतलुज फिल्म का विरोध करने वाले उस दोर में पंजाब पुलिस के सुपर लेकिन फिलाल इस पक्ष की बात इतनी है की इस फिल्मे जातर पुलिस की जात्तिया दिखाई गई हैं आतंगवात केहर नहीं दिखाई गया, आधा सच दिखाई गया।
और दूसरा वर्जन कहता है की आधा सच पूरे जूट से जादा खतरनाक होता है।तो ये इसकी मूल कहा अब सवाल है कि जब कोई देखी नहीं सकता तो आप फैसला कैसे करेंगे?कि किसकी बात सही है, किसकी गलत है?क्योंकि किसी चीज़ पर फैसला करने के लिए कम से कम कहानी तो जानना पड़ेगा।लेकिन कोई बात नहीं, फिल्म हटी है, कहानी नहीं हटी है. कहानी हम आपको � पंजाब की फिल्म है थी जिसमें हिरोहिन जो है वोपुरे देश ने उस पंजाब से बेंतहा महबब के हिंदुस्तान की सबसे चलने वाली फिल्मों में वो फिल्म रही।
लेकिन दुरभाग कोईंसिजन्स एत्तफाग देखिये कि उसी साल पंजाब के उनी खेतों के बीचे रातों को पुलिस की जीपे दौड रही थी।शमश एक ही पंजाब, एक ही साल, 1995 लेकिन दो कहानी एक, जो दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे की माध्यम से आपको दिखाई गई और दूसरी कहानी, पंजाब 95 की जो शिपाई गई ये सतलुच जो बैन की गई है वही दूसरी कहानी और शायद इसलिए इस पूरी फिल्म में ए क्योंकि अब हम आपको उसी पंजाब में ले जाने वाले हैं और ये सफर आसान नहीं रहने वाला।अब बात करते हैं इस फिल्म की क्योंकि इस फिल्म का पहला सीन ही इतना खतरनाक है कि आपके दिल में डर पैदा हो जाएगा।ये सीन है एक अंधेरी रात का।पंऔर उस अन्धेरे को चीरती हुई एक पुलिस की जीब दोड़ रही है।
इस जीब के अंदर पुलिस वाले बैठे होते होते हैं।गब ला रहे होते हैं।घर की बाते, ड्यूटी किस्से, शादी, ब्याह का जिक्र, हसी चिटोली।बिलकुल वैसा माहॉल होता है इस फिल्म क वही जीव, वही पुलिस्वाले, वही से छुटी हुई गफ़शब को बढ़ाते हैं।हैरानी की बात यह होती है कि इस फिल्में ये भी दिखाये गया कि एक पुलिस्वाला कहता है कि सर मेरी शादी इसलिए नहीं हो पा रही है क्योंकि मेरी बीवी ने कहा है कि जब तक तुम जैसे कोई काम निपटाया और घर चले गए।और इसलिए इस फिल्म के इस पहले सीन की सबसे डरावनी बात वो गोली से जादा वो गफ़शब लगती है।
क्योंकि कभी अगर आप किसी को घुसे में मारते हैं तो वो एक जुर्म कहलाता है।लेकिन बिना घुसे के आदत मेंजहां रात की जीप जिंदा लोगों को लेकर निकलती है और सुबे शमशानों में लावारिस लाशे पहुँचती है।अब आपको ये दुनिया समझना पड़ेगा क्योंकि इसके बिना ये कहानी अधूरी है।ये साल 1995 है।Operation Blue Star को 11 साल हो जगए थे।
इंद्रा गांधी की हत् कम से कम अख्बार की सुर्ख्यों में।लेकिन इसी सफाई अभ्यान की आण में वर्दी के भीतर के कुछ लोग एक और धन्धा चला रहे थे।धन्धे को समझ जीएगा।हर मारे गए आतंगवादी पर इनाम था।तरक्की था।मेडल था।
तो नुस्का आसान था।बन्� फिल्म का एक डैलॉग अस पूरे दोर को दो लाइन में सिम्टा देता है जहांपर कहा जाता है कि सिख ही सिखों को मार रहे हैं और मलाई ताकत पर खा रहे हैं और एक कड़वा सच जो किर्दार बार बार दोहराते हैं कि इस मुल्क में हालात तब बदलते हैं जब दिल्ली मेंमें पतनी है पम्मी यानी परमजीत कॉर।जिससे गीत का विध्या ने निफाया है।दो बच्चे और बुड़े मापाव।सुबे बैंक, शाम को घर।
उसके बाद गुरू में आस् ये किर्दार जस्वन्त का या दिलजीत का कोई सुपर हीरो नहीं है ये आप है ये आपका पडोसी है ये हर वो आदमी है जो सोचता है कि मुझे क्या पता मैं तो सीधा साधा आदमी हूँ मुझे किसी से क्या दुश्बन है और फिर एक दिन ये भरम तूट जाता है जस्वन्त अफसरों के दफतर जाती है तो बाहर बिठाय जाती है पर वो रुकती नहीं वो चीकती है लड़ती है हर दरवाजा पीटती है कि मेरा पुत्तर कहाँपर है जिन्दा है सामने लाओ मर गया तो लाश तो मैं कमसे कम आखरी अरदास तो कर लूँ और फिर फिल्म वो करती है जो � आज इसे मिला देते हैं और इस मिलाने का मतलब होता हैतुमको भी मार के तुम्हारे बेटे की पास बेश देते हैं और यही होता है वो जो शुरू में हमने एक शादी वाला सीन बताया था एक आदमी का कि उसे इंस्टेक्टर बनना था दो लोग बचे थे जो गोली मारी आती लेकिन दिल्जीद दुसान ने जिस व्यक्ति के किर्दार निभाया जो जस्वन साहब थे उनसे ये सन्नाटा बरदाश नहीं होता वो ठाने जाते हैं पूछने के लिए और यहीं पर वो डायलॉक आता है जिस फिल्म की जान है ठानेदार तुरंथ किरपाल को आतंगवादी कह और फिर वो बात जो कलेजी में उतरती है कि मा तो मा होती है चाहे भागी की हो, चाहे सिपाही की हो थानेदार के पास इससे कोई जवाब नहीं होता सिर्फ धंकी भरी नजर है कि ज्यादा उच्छल मत पर जस्वन्द के कान में इसी दोरान एक अजीब सी आवास पढ़ती है शऔर फिर वो लावारिस लाशों को ढूंडना शुरू करता है।कितनी सही लाशे क्यों?किसकी लाशे हैं?और अगर हैं तो शम्षान लेकर आता कौन है?
और यही एक सवाल इतिहास बदलने � लाशें धेरो आ रहे हैं।फिर रेजिस्टर दिखायाते हैं।पुराने धूल खाय रेजिस्टर जिनके पन्नों पर तारीखें हैं।और एक ही शब्द बार -बार लिखा है।लावारिस, लावारिस, लावारिस।यस्वन के दिमाग में एक जासूसी वाली तरकीब आती है और फिर दिलजीत उस काम में लग जाते हैं।
"99% accuracy and it switches languages, even though you choose one before you transcribe. Upload → Transcribe → Download and repeat!"
— Ruben, Netherlands
Want to transcribe your own content?
Get started freeइसी काम में उसे एक एसा साथी मिलता है जिसकी उमीद उसे भी नहीं होती है।एक पुलिस वाला, सीनियर कॉंस्टेबिल, सत्नाम सिंग्ग, जो सौरब सचदेवा ने किर्दार लिवाया है।वर्दी के भीतर के एक ऐसा आदमीसोरफ सचदेवा किर्दार ऐसा है कि आपको उस किर्दार के अंथ होते होते पुरा लड़ने लगता है घर में उसकी बूड़ी मा है और ये किर्दार याद रहता है इसकी इमानदारी कीमत आगे चलकर आपका दिल तोड़ते गी परत दरपरत खुलता आता है उठाएगे बन कि फला जगह एंकाउंटर में एक अंजान आतंगवादी ढेर।लाश सीधे समशान।रेजिस्टर में लिखा गया लावारिस।
क्यानी वो लोग जिनके घरों में उस पल भी उनका इंतिजार हो रहा था वो लावारिस बन रहे थे।और यही इस फिल्म की कहानी है।जस्वन आगे चल कर सुप्रीम कोट के आदेश पर CBI जाच होती है।और अकेले तरन -तारन जिले में हैसे 2000 से उपर अन्तिम संसकार पक्रिके गए।यानि ये कोई सिर्फिरे का एलजाम नहीं थे।ये सरकारी जाच में साबित हुआ सच था।
और सबसे बड़ा सबूत कि जयातर ला� जस्वन्त खालडा की जांच और बाद में तमाम रेपोर्ट्स में ये गिंती 25 ,000 तक लापता लोगों की बताये गई25 ,000 तक लापता लोगों की बताए गई 25 ,000 तक लापता लोगों की बताए गई 25 ,000 तक लापता लोगों की बताए गई 25 ,000 तक लापता लोगों की बताए गई 25 ,000 तक लापता लोगों की बताए गई 25 ,000 तक लापता लोगों की बताए गई यहीं से कहाणी के सबसे खतरनाख हिस्सा शुरू होता है कि सच बोलने की जरुवत क्या थी।क्योंकि जस्वन साहब ने उस दोर में सबूत इकठा किये थे।रेजिस्टर की कॉंपिया इकठा किये थे।लकडी की रसीदों का हिसाब, तारीख, नाम, गवा, सब रखा था।फिल्म में एक ताना बार बार निकलता है कि ये ह्यूमन राइट वाले विदेशी पैसों पर पलने वाले हैं जो हिंदुस्तान को बढ़नाब करें।
ये डालॉग आपको जाना बैचाना लग रहा है।
कई बार सुनने को मिलता है कि ये विदेशी ताकतें बढ़नाब करें।
�आज भी आपको सुनाई पड़ते हैं।और आश्यली में ये हुआ था।1995 में पंजाब में जब ये सुनवाई हो रही थी तब एक डालॉग आया था विदेशी ताक्तों के हाथों बिके हुए लोग हैं।आज भी सुनते हैं।सिस्टम पहले न देखा करता है तर चार दिन श यानि 84 से हम अपने जख्मों तो अंदर दबाए बेटे हैं अभी भी दबाओ।
चुप रहो।जस्वन के जवाब उसके काम में है वो चुप नहीं होता।तो अब सला की जगा उसको डराया जाता है।उसके घर के बाहर पुलिस की गारियां खड़ी रहती हैं।रात बर नि� तो आम आदमी आमतोर पर क्या करता है?चीकता, चलाता, घुसा करता है।
जस्वन घर के अंदर जाता है और चाय लेकर आता है।और पुलिस वाले जो जासूसी करे थे उनको चाय पिलाता है और कहता है कि ये थग गए होंगे आप लोग।बस कप अंदर रखा दीजेगा, वऔर यह लड़ाई वो घर में भी लड़ रहे थे।एक लड़ाई जिसमें उनकी पत्नी कहती है कि तुम सारी दुनिया के उनसाफ के लड़ रहे हो, हमारा क्या होगा?बच्चों क्या होगा?
और इसका उनके बाद जवाब नहीं होता।कोई डालॉग नहीं, भाषर नहीं, सब एक डरे हुए आदमी का सीधा हिसाब है कि जिस पुलिस से जानना खत्रा है उसी पुलिस की बंदुगधारी को दर्वाजे पर खड़ा कर ला।रखवाला भी वही, शिकारी भी वही।हाला कि इसी बीच इस फिल्में दिखाये गया जो रियालिटी भी थी कि जस्वन्त की आ� सारे दुनिया चुप रही, बड़े बड़े सिर जुख गये।तब दूर किसी जौपडी में एक ननना सा दिया बोला, मैं करूँ।जितना मुझसे हो सकेगा, उतना करूँ।
मैं अन्धेरे को शुनोती देता।और कुछ नहीं, तो कम से कम अपने आसपास तो अन्धेरे कअब सवाल है कि दिलजीत की फिल्म सतलुश में वो कौन से पुलिस वाले थे जिन पर fake encounter करके पंजाब में बच्चों को मारने का रुख था लोगों को मारने का रुख था जिन पर 25 ,000 लोगों का कतल का रुख था तो उन छेरों से भी मिलवाते हैं फिल्म में नाम बदले गए ह सुविन्दर विक्की साहाँ ने निपाया।विक्की साहाँ वैसे भी कमाल के आक्टर हैं और बहुत अच्छे सिख रॉल करते हैं।धुरंदर में भी ये थे।कोहरा में बहुत जबर्दस आक्टिंग की ये नुने।
ठंड़ी आखें, धीमी ठैरी हुई आवास, ना चीकते क्योंकि डर था सुग्गा आएगा उठा ले जाएगा एंकाॉंटर कर देगा।सुग्गा की इस फिल्म में अपनी सोच दिखाई गई है।उसे टेरिजम खतम करना था।इस फिल्म ऐसा दिखाए गया है।तो सुबे को साफ करना था तो बीच में कुछ बेगुना भे निप पूरी फिल्म में आप इस आदमी से नफ़रत करते हैं, लेकिन जब आखरी में वो सीन आता है ज़ाने के लिए...मर जाते हैं वहाँ पर आपको इनके लिए तरस भी आता है क्योंकि तब आपको समझ में आता है कि ये भी उसी चक्की का पार्ट थे जिसे खुद चला रहे थे और चक्की किसी को नहीं � पंजाब पुलिस का सबसे बड़ा अफसर, जिसे कवल जीत सिंगे निपाया।
अबदिल जीत तुसांज की सतलुच पिछर में जिस character को लेकर सबसे जादा controversy हो रही है, वो character है DGP इंदर पाल सिंग बिट्टा।जो असली character है, वो है DGP के पी एस गिल।के पी एस गिल।अग किस उफिसर ने पंजाब से आतंगवात का पूरी तरह सफाय कर दे और एक छवी जो इस फिल्म में दिखाये गई जिसमें दिखाये गया कि KPS गिल ने आतंगवात की सफाय के नाम पर कई सारे बेगुनाहों को भी माल दिया. KPS गिल के बारे में थोड़ी हम आपको और जानकारअब वो अफसर थे जो इनकी अगवाई में 1993 आते आते आते पंजाब से आतंगवाद लगबाख खतम हो गया था।कई ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि फोज जो काम नहीं कर पाई थी वो पंजाब पॉलिस ने किया था।
साल 1988 में उनहीं की कमान में सुरणमंदर से आतंगवाद Black Thunder. उस रडाई में पंजाब पुलिस के करीब सत्रा सो जवान शहीद हुए और पुलिस वालों के परिवार तक आतंगवादियों के निशाने पर थे।लेकिन 1993 के बाद पंजाब में एक वर्ग मानने लगा था की पंजाब अब धीरी धीरी नौर्मल हो रहा है।स्कूल खुल ना खाता ना बही जो केपियस गिल को लगता था वही सही पंजाब में उस साहब में।गुमचुद्गियों के मामले में केपियस गिल पर कभी कोई जुर्म साबित नहीं हुआ ये भी सच बात है।लेकिन इन ही गिल साहब को जिने आतंगवाद हटाने का पूरा क्रेड़िटमानव अधिकार संगट्नों ने उनके दौर में कई एंकाॉंटर्स को नकली बताया है।
हलाकि एक वर्ग ऐसा भी है जो इनको सुपर कॉप मानता है, हीरो मानता है, इनकी बहुत इस्जट करता है।और वो भी मानता है कि अगर आज पंजाब भारत से अलग नहीं हुआ, भारत फिल्म इन में से एक के दर्ध को दिखाते हैं दर्ध जहांपर KPS गिल पर फर्जी एंकाउंटर के आरोग लग रहे हैं और वह दूसरा वाला दर्ध भी सच है इस दर्ध की तरह जैसे ये दर्ध सच है एसे एक दर्ध और भी है फिल्म में बिट्टा वो आदमी है जो उफसरो उसे सिर्फ खलनायक दिखाना उसकी उस दोर की देश सेवा को बदनाम करना था।लेकिन जो समर्थक हैं वो कहते हैं की फिल्म ने तो किसी का नाम ही नहीं लिया।फिर भी बुरा लगा तो क्यों बुरा लगा।यह सोचने वाली बात है।यहाँ दोनों की पास अपने अपन
साफ तोर पर उस दोर के मुख्यमंत्री बेयन सिंग्ज से मिलता जुलता।अब बेयन सिंग्ज सहाब वो हैं जिनकी कहानी अपने आप में एक दिल्चिस्व कहानी है।कॉंग्रेस के सीयम जिनके राज में जुल्म का ये खेल सबसे तेस चला।फिल्म में एक सीन है जहांपर चंडीगड सचवाले के बाहर एक धमाका होता है और मुख्यमंतरी गाड़ी के परखचे उड़ जाते हैं।असल इतिहास में धमाका पंजाब पुलिस के एक जवान दिलावर सिंग्ञ ने खुद को इंसानी बम बना कर किया था।यही वो हिस्सा है जो उसपर विरूधी सबस पर सच कहें तो बहस यहाँ खतम नहीं होती है जो साद्मी के हत्या हुई वो एक चुनी हुई सरकार का मुख्या था उस साजिश के दोशी अदालत में सजा पा चुके है ये बात फिल्में नहीं है और जो लोग इसे जानते हैं उन्हें ये कमी खलती है और ये कोई सिया
प्रहाणी का सबसे चोटा आदमी ही आगे चल कर इसका सबसे बड़ा आदमी बगता है।वो है SPO कुलजीत से, यानि जगजीत संधू।Special Police Officer System का निशला पुर्जा।ना rank, ना ताकत, ना पक्की नौकरी।वो पुर्जा जो सवाल नहीं करता, सिर्फ हुक्म हो जाता है।ग� जिससे आप पहले ही मिल चुके हैं, जिसका नाम सत्नाम सिंग है।
सौरव सच दिवा वाला करदार।इमानदार पुलिस वाला।सुगगा और सत्नाम के बीच सत्नाम के घर पर एक बड़ा दिल दहलाने वाला सीन है।पूरी फिल्म में बस एक ही बार ये दोनों इस जगे आम अगर ये फिल्म रिलीज होती ही इंटरनेट पर, तो ये सीन मैं आपको बताता नहीं।क्योंकि ये सीन आपसे छीनने का मुझे हख नहीं था, लेकिन आपको क्योंकि फिल्म रिलीज नहीं होई है, इसलिए मैं आपको बता दे रहा हूँ।सौरफ सचदेवा किरदार, जो दि
उसके साथ दो और लोगों को मारा आता है और साथ में उसकी बूड़ी मा को भी मार दिया।और ये बहुत डरावना है।हालाकि ये सीन ये भी बताता है कि हर वर्दी वाला शैतान नहीं हो।ये फिल्म में वो सीन है जो दिखाता है कि उस वक्ष भी कई इमानदार लोग थे जो जमीर जिंदा रखकर बचना चाहरे थे।हुक्म � जस्वन्त जो शम्षान के रेजिस्टर में लावारिस लाशों को खोच खोच कर सरकार से इनसाफ मांग रहा था ये कहते हुए कि किसी की घर में सुहागन है जो न विद्वा कहते हैं।किसी के पती की मौत का कोई हिसाब नहीं।
Transcribe all your audio with Cockatoo
Get started freeकिसी के घर में बच्चे हैं जो बाप की शकल भूल गए।हर दरवाजे पर तूटती उमीद और उमीद का तूटना मौत से आदरदनाक होता है।और पूरी फिल्में इस दरद पर कोई मरहम नहीं लगता।जस्वन्त सब को सच पता वही सुबह जहां से हमने कहानी के शुरुबात की थी।अमरिस्सर का कभीर पार्क।जस्वन घर के बाहर काड़ी धो रहा था।
जो आदमी हजारों गुम्चुदा लोगों का हिसाब मांग रहा था, वो गुम्चुदा हो जाता।दिन दहारे अपने घर के सांगे से।उसी � क्योंकि तब तक जस्वन साहब अकेले नहीं थे।उनकी आवास हजारों घरों में पहुँँ पहुँँ पहुँँ थी।अदालतों के फाइलों में।साथ समंदर पार के संसट तक।
उसकी खायब होने पर पंजाब से लेकर कैनेडा तक शोर मुझा।और ये किसी अंजान ग CBI Officer, समुद्रा के रोह, दिल्ली से आये एक बाहरी आदमी जिसे पंजाब के इस दलडल में उतर कर एक गुम्शुदा आदमी को ढूंडना है।उसके सच को ढूंढना था।एक दिल्चस बात इस फिल्में जानते क्या है?पूरी फिल्में दिल्जीत और अर्जुन रामपाल का एक भी सीन साथ नह जो गवा हिम्मत करके मुख खोलने को तयार होता है वो सुनवाई से पहले हट जाता है या किसी हाथ से मार जाता है और जो अदालत पहुँचता है वो बयान से पर जाता है क्योंकि पिछली रात उसके घर कोई मिलने आय था उसके बीबी बच्चों का हाल चाल जानने एक सीन मे जो उस रात को उस जगे मौजूद था।इस सिस्टम के अंदर का सबसे चोटा पुर्जा, जिसने सब कुछ अपनी आखों से देखा था।
आपको उनने किर्दार बताया शुरू में, SPO कुलजीत सिंग, समुद्रा उस तक पहुँशता है और अब फिल्म का सबसे बड़ा ज�वो चली वो पूछताच जो पूछताच नहीं थी बदला थी सामने बैठे वो उफसर जिननी कर्तूरों की फायलें जस्मन ने दुनिया को दिखायी थी और बीच में वो आदमी जिसने कभी किसी पर हाथ नहीं उठाया जो निग्राणी करने वालों को पानी पिला रहा था फिल उसके सामने दो रास्ते हैं।चुप रहो, जीते रहो, बोलो, मर जाओ, गायब हो जाओ।फिल्म दिखाती है कि जब सिस्टम का सबसे मामुली आदमी सच बोलने की ठान लेता है तो सिस्टम की सबसे बड़ी अमारत भेल जाती है।और इस काले सफर की बीच फिल्म में एक अ आपको समझ नहीं आता कि क्रियाट कैसे करें फिर दालत कब आखरी सीन परमजीत कौर बैठी होती हैं बर्सों की लड़ाई, बर्सों की अंजार, बर्सों का सब दिल टूट जाता आपको एक औरत जिसका पती सच बोलनी कीमत में चीन लिया गया है और इनसाफ उसी सिस्टम से मरही है जो उसने उसका पती छीना।
खेर आखरी में सच आता है उस छोटे से किर्दार की तरफ से और बहुत बड़ा सच होता है।और उस सच की विज़ा से पंजाब पुलिस की छे पुलिस वालों को खालड़ा को उठाने और मारने की जुम यब पंजाब 95 में उस दोर में जिस जांच में 25 ,000 गुमशुद्गियों की बात की गई थी क्या उसमें सजा सिर्फ 6 सिपाहियों का?और क्या 6 आदमी हजारों गायब कर सकते हैं?हुक्म देने वाले हाथ कहां गयें?उपर की कुर्सियों तक इनसाफ की सीड़ी क्यों नहीं प आपके मुन में सवाल आया होगा न, फिल्म का नाम सतलुज क्यों रखा गया?दिल्जी दोसांश के फिल्म, जिसके तीन बार नाम बदले गये, वो पच्जाब 95 से सतलुज क्यों बनी?
दरसल, CBI की जांच और अदालतों में हुई गवाहियों के मताबिक, कैद में हत्या के बाहैं।आप समझ रहे हैं।जिस दरिया ने पंजाब के धर्ती सीजी जिस दरिया के दम पर पंज आब यानी पांच पानीयों की ये धर्ती बसी उसी दरिया के बहने में पंजाब के एक बहादूर बेटे को हमेशा के लिए गुम कर द तो जब सिंसर ने फिल्म से पंजाब 95 का नाम छीना, तो फिल्म वालों ने वो नाम जुना, जो खुद पूरी कहानी कह देता है।सिंसर ने सोचा होगा कि नाम बदलवाद या धार खतम कर दी, लेकिन फिल्म वालों ने तो नाम में ही पूरी कहानी की रूँ भर दी।कि असली जस्वन सिंख खालडा एक राजनेतिक सोंच वाले परिवार से आते थे।
उनके पीछे लोगों का पूरा अंधोलन खड़ा था जबकि फिलमें उन्हें पॉलिटिक्स से अन्जान आस्था के साहरे खड़ा एक नॉर्मल आम इनसान दिखाये गया।इससे उनकी शक्स इसे मानने में कोई हर्ज नहीं है।इन कमियों को लेकर दो राय हैं।एक पक्ष कहता है आधी कहानी दिखाना अपने आप में जूटा प्रचार है।दूसरा कहता है अधूरा सच कहना है।गर्णा दो अलग चीजे होती है ये फिल्म जो भी कहती है अधालते रिकॉर्ड के साहरे कहती है कौन सही ये कौन गलत इसका फैसला हम आपर चोड़ेते हैं � कि फिल्म पूरी करने के बाद उन्हें हफ़ते भर की चुट्डी लेनी पड़ी।
इस तरह से किर्दार निपाया है।किरदार से बाहर आने के लिए, बिना चीखे, बिना भाशडबाजी के लिए।सिर्फ आँखों से कई जगहं वो कहा है जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता डूपते सूरश का सवाल जोपडी के दिये के जवाब।मैंने कहा था ये कहानी लौटेगी और इसका मतलब भदल चुका होगा।दिलजी दुसान्श की फिल्म पंजाब 95 जिससे सतलच के नाम से रिलीज किया गया जब वो फिल्म पर बैन लगा तो सोशल मेडिया पर सिर्फसाल 1995 में एक दिये को बुढ़ाया गया था, साल 2026 में लाखो दिये जल गया हैं।
दिया बुढ़ाने वाले बस एक बात नहीं समझें कि दिये से दिया जलाया जा सकते हैं।Zee5 ने भी कहा है कि सतलुश ठहर गई है पर जो बाचीत इसने शुरू की है वो नहीं ठहरेगे।और जिस मुलक में इनसाफ मांगने वाला आदमी गायब कर दिया गया वो आदमी जो 25 ,000 गायब हुए आदमियों की कहानी को इनसाफ दिलाना चाहरा था उस मुलक में उस आदमी की कहानी को भी गायब कर दिया गया 25 ,000 लोगों को लावारिस कहकर मार दिया गया जला दिया गया गु किनारों तक पहुँचाती है।
आज दिया आपके हाथ में।
वो दिया जो 1995 में एक आदमी ने जलाया था।ये कहते हुए कि मैं अंधेरे को चुनौती देता हूँ।अगर आपको लगता है कि ये कहानी हर घर तक पहुँचने चाहिए।तो आपके जिम्मदारी है।इससे आहमने अपना काम किया दिलजीतने अपना काम किया आप इस अंधेरे में रहना पसंद करते हैं या आप अंधेरे को चुनौति देते हैं फिलाल इसका हाथ
Get ultra fast and accurate AI transcription with Cockatoo
Get started free →
